बोल कि लब आजाद हैं तेरे
व्यंग्य
शायर ने तो केवलों लबों के आजाद होने की बात कही थी लेकिन मास्टर छप्पन सिंह के तो लबों के साथ-साथ हाथ और बुद्धि भी आजाद हो गये थे। सबसे बड़ी बात उनकी कलम को आजादी की लत लग गई थी। कलम की आजादी भला किसी भले आदमी को क्यों भाने लगी ? और वह भी तब जब उस एरिये के विधायक की ’सत्य कथा’ सामने आ रही हो। वोटरों का दिल नहीं टूटेगा कि जिस बाहुबली के बल पर भरोसा करके उन्होंने वोट दिया था, उसे एक मास्टर चुनौती दे रहा है।
ताजा मामला विश्वविद्यालय का था जहां लड़के मुख्य धारा के विपरीत जाकर ’रोजगार’ की मांग करने लगे थे जिससे शांति जो थी वह भंग हो रही थी। कानून जो कि बड़ों के हाथों की शोभा है उसे यदि बच्चे अपने हाथ में लेने लगे तो विधायक जी का चिंतित होना स्वभाविक ही है। विधायक जी की चिंता से थानेदारजी का आतुर होकर, देश के भविष्य को लाठियों से कूटना कायदे से किसी धारा में नहीं आता लेकिन मास्टर जी ने आलेख लिख-लिखकर मामले को और विधायक जी को चर्चित कर दिया। देश की रक्षा का आतुर दारोगा जी मोर्चा निकालते समय ही जा पहुंचे और उन्होंने छप्पन सिंह को जा दबोचा। दरअसल में वे विधायक जी को ही देश मानते थे। थाने में लाकर उन्होंने ’प्रेमपूर्वक पूछताछ की-
-’’ क्यों बे ! साहब के खिलाफ नारे लगाता है ? जगह पर तीन और बेजगह चार डंडे पड़े तो सारी नेतागिरी गलत जगह से निकल जायेगी। क्या काम करता है ?’’
-’’ स्कूल मास्टर हूं।’’
-’’हद हो गई यार। मास्टर होकर नारे लगाते हो ! शर्म आनी चाहिए। तेरा काम बच्चों को पढ़ाना है कि रोड पर मज़मा लगाना ?’’
-’’ हम मज़मा नही लगा रहे थे, श्रीमान्। विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। यूनिवर्सिटी में कल जो लाठी चार्ज हुआ था, उसमें विधायक जी मौजूद थे। इनके इशारे पर बच्चों पर लाठियां चलाईं गईं। छात्रों की गलती क्या थी ? बेरोजगारी के खिलाफ मोर्चा निकाल रहे थे। यह गलत है क्या ? अभिव्यक्ति की आजादी तो हमें संविधान देता ही है।’’
दारोगा जी को घनघोर आश्चर्य हुआ। सामने दारोगा हो, हाथ में डंडा हो, आदमी थाने के अंदर हो, फिर भी संविधान की याद आ रही है। हे प्रभु ! आनंद दाता ज्ञान इसको दीजिये। मास्टर को मारना तो काननून जुर्म नहीं है। वैसे भी, आठ-दस डंडे मारने से कोई धारा टूटने वाली है भी नहीं। उन्होंने अलबेला सिंह को आवाज दी-
-’’ अलबेला सिंह, ज़रा प्रगतिशील लाठी लेकर आओ और साहब को सिखाओ कि विधायक एरिये का भगवान होता है और भगवान के खिलाफ नारे नहीं लगाये जाते।’’
अलबेला सिंह जी लाठी के साथ प्रकट होकर अपना काम आरंभ करें तब तक मास्टर साहब के आजाद लबों ने एक अपराध और कर दिया। उन्होंने थाने में खड़े होकर दारोगा से सवाल करने का गुनाह कर दिया-
-’’ आप मेरे साथ अपराधियों जैसा व्यवहार नहीं कर सकते। मेरे खिलाफ कोई एफ आई आर दर्ज नहीं है।’’
मिजा़ज खुश हो गया दारोगा जी का। उन्होंन गदगद होकर ठहाका लगाया। सुबह से पहली बार उनका तनाव कुछ कम हुआ था। भारी बेवकूफी की बात सुनकर उनको हसंी आ ही जाती थी। उन्होंने हंसते हुये कहा-
-’’ तुम वाकई बेवकूफ हो। तुम्हें क्या पता कि हम अपराधियों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। यदि कोई सम्मानित अपराधी का आगमन थाने में हुआ होता तो अभी, भुने हुये नमकीन काजू और रंगीन पानी चल रहा होता यहां, मास्टरसाहब। थाने में अपराधी को वही इज्जत दी जाती है जो मंदिर में पुजारी को। उसीके चढ़ावे से हमारा घर-परिवार चलता है तो बेचारे को हमारा आशीर्वाद मिलना चाहिए कि नहीं ? रही बात तुम्हारी, तो तुम्हारे साथ दो कौड़ी के शरीफों वाला मामला बनता है। भारी-भरकम शरीफ आदमी तो हमें ही बुला लेते हैं और खुद ही बता देते हैं कि उनसे कितनी दफायें टूटी हैं। हम मरम्मत में लग जाते है।
और क्या कहा तुमने? रहोगे मास्टर के मास्टर ही, पढ़ाने से बाज नहीं आओगे ? एफ आई आर तो हमारी खेती है माट साब। कहो तो आठ दस लाद दें। तीन साल के लिए अंदर जाओगे। एहसान मानो कि हम लाठी मारकर ही छोड़ रहे हैं।’’
मास्टर छप्पन सिंह एहसान मानने लगे क्योंकि बात उनकी समझ में आ गई। बात समझ में जल्दी आने का एक कारण यह भी था कि सामने अलबेला सिंह लाठी ’प्रगतिशाल लाठी’ लेकर सदेह उपस्थित हो चुके थे और ललचायी नजरों से श्री छप्पन सिंह को ताक रहे थे। जैसे ही उन्होंने देखा कि बात अपने अल्पविराम तक जा पहुंची है तो मास्टर साहब को आदरपूर्वक अंदर खींचने लगे। एक छोटी-सी कोठरी थी जिसमें बिठाकर ’राष्ट्रीय स्तर’ की सेवायें दी जाती थीं। मगर, मास्टर साहब भी खाये-अघाये आदमी थे सो अलबेला सिंह केे हिलाये हिल नहीं रहे थे।
तभी दारोगा जी के मोबाईल की घंटी बजी.....इतनी शक्ति हमें देना दाता...........।
-’’जी, सर, जयहिंद सर! ’’ बोलेने के साथ ही दारोगा जी कुर्सी से उठ गये और हवा में सैल्युट-सा मारने लगे।
-’’ नहीं, सर, मोर्चा तो रोक दिया गया है। दो-चार लोग पकड़ में भी आ गये हैं। उनमें एक मास्टर है छप्पन सिंह, वही नेता था। सामने ही खड़ा है। नहीं, नहीं , जी....जी’... सर। जयहिंद सर।’’
जयजयकार कर चुकने के बाद उन्होंने गर्दन टेढ़ी करके छप्पन सिंह को देखा और बोले-
-’’ माटसाब, विधायक जी का फोन था। उन्होनंे तुम्हें छोड़ देने के लिए कहा है। और वह भी बिना मारे-पीटे, सूखे-सूखे। यूनिवर्सिटी के बच्चों की चिंता छोड़ो और अपने बच्चों की चिंता शुरू कर दो। सरकारी मास्टर होकर , सरकार के खिलाफ नारे लगाते हो ? बेरोजगारी तो अज़र, अमर, अविनाशी है, यह न जन्म लेती है, न मरती है बस इसका रूप बदल जाता है। पिछले सरकारों में भी थी, अभी भी है और आगे भी बनी रहेगी। उसके लिए अपनी नींद खराब मत करो, जाओ और साहब के डेरे पर जाकर उनसेे माफी मांग लेना । साहब ने हमें बताया कि देश में लोकतंत्र नाम की चीज जिंदा है इसलिए सबको रोने का हक हासिल है। सीधे निकलो और घर जाओ।’’
छप्पन सिंह थाने से निकले तो उनका मन एक किलो का भी नहीं रह गया था। बचपन की कुसंगतियों के कारण उनमें लिखने-पढ़ने की लत थी। मास्टर बनने के बाद भी उन्होनंे लिखना-पढ़ना नहीं छोड़ा था जिसके लिए अक्सर मजाक के पात्र बन जाया करते थे। लिखने-पढ़ने तक ही कुटेब रहे तो ठीक, उन्हें गलत का विरोध करते भी रंगे हाथों कई बार पकड़ा गया था। महीने में मोटा वेतन पाकर भी, देश और समाज की चिंता करते रहने की कमजोरी अभी तक गई नहीं थी। पत्नी के साथ रोमांटिक डेट पर जाने के बजाय, शाम में विचारगोष्ठियों में जाने की बुरी लत से घर वाले परेशान थे। रोज शाम कहीं न कहीं से गोष्ठि करके आ जाते थे। नगर में एक मंच भी बना रखा था-’प्रगतिशील विचारमंच’। इसमें अधिकारियों को दो समस्यामूलक शब्द लगते थे एक-प्रगतिशील, दूसरा विचार। मंच बनाकर जो मर्जी तमाशे करो किसी को एतराज नहीं मगर विचार नहीं कर सकते। यह काम सरकार का है और उसीको शोभा देता है। उन्होंने सरकार की नीतियों के खिलाफ आलेख लिखकर और अखबारों ने उसे छपवाकर गलती तो कर ही दी थी। ऐसे में, उन्हें हेडमास्टर की लताड़ भी सहनी पड़ी थी-
-’’ बहुत बड़े ’भगत सिंह’ हैं आप तो कहीं और जाकर फांसी चढ़िये। हमारे स्कूल को छोड़ दीजिये। ऐसा न हो कि आपके साथ पूरा विद्यालय ही माटी में मिल जाये।’’
छप्पन सिंह ने जब मौखिक आरोपों का कोई उत्तर नहीं दिया तो उन्हें ’मेमो’ अर्थात कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया जिसका जवाब उनके पास तैयार ही रहता था। सरकारी सेवकों को गर्दन झुकाकर ’जी’ के अलावा कुछ बोलना नहीं है यह याद दिलाया गया जो कि मास्टर होने के नाते श्रीमान जी को पहले से ही याद था। वह तो आदत थी जो जाती नहीं थी।
थाने से निकलकर छप्पन सिंह सीधे घर की ओर भागे लेकिन पहुंच गये अस्पताल। रास्ते में अखबार की कतरन हाथ में लिए आठ-दस लड़के उनके इंतजार में दुबले हुये जा रहे थे। उनका रोजगार ही था आदमी को सही रास्ते पर लाना, उसे सबक सिखाना। सबक चाहे धर्म के नाम पर हो, देश के नाम पर या पार्टी के नाम पर, सिखाते यही लोग थे। उनको बताया गया था कि कोई मास्टर है जो अखबार में साहब के खिलाफ लिख रहा है। उसे सबक सिखाने की जरूरत है, हल्के-फुल्के तरीके से उसे अक्ल की पहली डोज दी जाये।
मास्टरसाहब वहां से गुजरे कि बेरोजगार गैंग के मुखिया श्री बंठा सिंह जी ने उन्हें सूचित किया-
-’’ माटसाब ! हम पिछले दो घंटों से आपका इंतजार कर रहे हैं। आप हैं कि हमारी ओर बिना देखे ही जा रहे हैं।’’
मास्टर साहब की बाईं अंाख फड़की। उन्होंने धीरे-से कहा-
-’’ जी कहिये क्या काम है ?’’
-’’ ऐसा ही एक आलेख लिखवाना है लेकिन बदनाम किसी विरोधी दल का करना है। कर पायेंगे ?’’
मास्टर साहब के अच्छे दिन अभी आये नहीं थे सो उनके अंदर का लेखक फिर खड़ा हो गया तनकर-
-’’ ये क्या बात हुई। मैं ’पेड लेखक’ नहीं हूं। बेरोजगार लड़कों की समस्या है जिसपर मैंने अपनी कलम चलाई है। नई पीढ़ी का भविष्य अंधेरे में है और आपलोग मुझसे सवाल कर रहे हैं? मैने किसी को बदनाम करने की कोशिश नहीं की है लेकिन जिसकी सरकार होगी सवाल तो उसी से होंगे।’’
-’’ आपने इसमें साफ-साफ लिखा है कि यूनिवर्सिंटी में हुये लाठी चार्ज में विधायक जी का हाथ है। आप ही पुलिस और आप ही जज। आप थे क्या लाठी चार्ज के समय यूनिवर्सिटी में ?’’
-’’ जी बिल्कुल था। मैने सारा वाकया अपनी नजरों से देखा था।’’
-’’ कमाल है, थे तो हम भी वहीं पर हमने तो अपनी नजरों से विधायक जी को नहीं देखा। आपको भी नहीं देखा। पुलिस भी कहती है कि विधायक जी उस दिन नगरभवन में गये थे। उनका दौरा उधर था ही नहीं। अखबारों में भी यही लिखा है कि समाजविरोधी ताकतों ने यूनिवर्सिटी में बलवा किया। आपकी ही आंखें काम करती हैं बाकी सबकी अंधी है ?’’
अभी मास्टर छप्पन सिंह बात का जवाब बात से देते कि एक लात आ लगी जिसका जवाब उनके पास नहीं था। उन्होंने कलम चलाई थी, लाठी से परहेज करते रहे थे। वही गलती आज भारी पड़ गई। श्रीमान बंठा के आधे घंटे की कड़ी मेहनत और बुलंद इरादे ने माटसाहब को अस्पताल पहुंचा दिया जहां डाॅक्टरों ने सूचना दी कि उनके बायें हाथ की हड्डी चटक गई है। सिर में केवल आठ टांके लगे हैं और सबसे बड़ी बात कि जान इसबार भी पूरी की पूरी बच गई है। छप्पन बाबू की आंखें खुली तो सामने रोती हुई पत्नी और कोसते हुये बाप दिख गये। उन्होंने कड़ाहते हुये बताया कि उनको एकबार फिर होश आ गया है।
दो दिनों में केवल बीस हजार खर्च करके मास्टर साहब आजादी का अर्थ समझने की कोशिश कर रहे थे। लबों को तो आजादी मिल गई थी लेकिन हाथ-पावं,गर्दन और सबसे बड़ी बात रीढ़ को आजादी अभी तक मिली नहीं थी। रीढ़ को गिरवी रखकर ही जीभ को आजादी मिल रही थी। जीभ को लपलपाने और तलवे चाटने की आजादी तो थी लेकिन सच बोलने की नहीं। तुलसी दास जिस बात को तीन सौ साल पहले समझ गये और लिख दिया ’समरथ को नहिं दोष’ उस बात को मास्टर छप्पन सिंह आज तक नहीं समझ पाये तो इसमें किसी बंठा या विधायक जी की गलती नहीं है। मास्टर जी के एक हाथ को बांधकर गर्दन से लटका दिया गया था ताकि वह लबों की तरह आजाद न रहे।
अगले दिन, हाथों में बैंडेज सजाये और सुजा हुआ चेहरा लिये छप्पन सिंह थाने पुनः जा पहुंचे। उन्होंने अपनी आत्मकथा दारोगाजी को सुनाई जिसे सुनकर उनपर तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ा। वे हनुमानजी की आरती गा रहे थे और करते रहे-’आरती कीजै, हनुमान लला की, दुष्टदलन रधुनाथ कला की........। आरती के बाद उन्होंने एक वाक्य जरूर खर्च किया -
-’’ तुम फिर आ गये मास्टर ? ’’
-’’ मै विधायक जी पर एफ आई आर दर्ज कराना चाहता हूं क्योंकि उनके गुंडों ने मुूझपर हमला किया।’’
-’’ आपके पास कोई सबूत या गवाह है ?’’
-’’ सबूत और गवाह खोजने को काम आपका है।’’
-’’ और आपका धुलाई करवाने का। हमसे जो कसर रह गई आपने पब्लिक से पूरी करवा ली। माने हद है, आप सप्ताह भर यहां-वहां ठुकते रहें और हम यहां बैठकर विधायक जी पर केस करते रहें। हद दर्जे के कठजीव आदमी हैं आप माटसाहब। आदमी एक या दो बार हाथ-पांव तुड़वाकर सुधर जाता है और आप पिछले तीन सालों से सुधरने का नाम ही नहीं ले रहे।’’
-’’ मतलब एक आम आदमी को न्याय नहीं मिलेगा ?’’
-’’ कमाल करते हैं आप। आपकी जान उन्होंने छोड़ दी फिर भी आपको लगता है कि आपके साथ अन्याय हुआ है। आपको तो उनका शुक्रगुजार होना चाहिए। बंठा जब जवान था उसके मार से बच पाना किसी के लिए मुश्किल था। समय-समय की बात है। तो, अब आप अपने आप जायेंगे या हम ही जनहित में कुछ कोशिश करें।’’
मास्टर छप्पन सिंह घर लौट तो आये मगर उनके मन में क्रांति की ज्वाला फूट रही थी। पास, नागार्जुन, मुक्तिबोध एकसाथ मन में आकर तहलका मचा रहे थे। उन्होंने तय किया कि वे नौकरी से इस्तीफा देकर होल टाईमर क्रांतिकारी बनेंगे। हद से हद क्या होगा, गांव में जाकर खेती करनी होगी तो करेंगे। बच्चे गांव के स्कूल में पढ़ेंगे तो पढ़ें औरों के भी तो पढ़ते हैं।
छप्पन सिंह जी ने मन को कड़ा किया। जेब में इस्तीफा लेकर अगले दिन स्कूल पहुंच गये। उन्होंने हेडमास्टर साहब को देने के लिए एक पत्र निकाला तो जरूर लेकिन वह पत्र उनके हाथ में ही रह गया क्योंकि हेडमास्टर साहब के हाथ में भी एक पत्र था जो वे छप्पन सिंह को ही समर्पित करना चाहते थ। उनको नौकरी से सस्पैंड कर दिया गया था कारण ’उनकी राजनीतिक गतिविधियां एक सरकारी नौकर के अनुरूप नहीं हैं।’ अगले आदेश तक के सस्पैंड होकर मास्टर साहब के पांव के नीचे की जमीन खिसक गई। साथ ही उनको आदेश दिया गया था कि रोज मुख्यालय रिपोर्ट करंें। मुख्यालय अर्थात साठ किलोमीटर दूर, डी इ ओ साहब का आॅफिस जहां जाना शेर की गुफा में जाने से कम नहीं था।
देश का तो पता नहीं पर छप्पन बाबू के घर में उसी शाम से , लोकतंत्र कायम हो गया। पत्नी ने उन्हें साफ-साफ कह दिया कि यदि उनके चाल-चलन में सुधार नहीं हुआ तो वह अपने बच्चों के साथ मायके चली जायेंगी। ऐसे आदमी के साथ रहकर वह अपने बच्चों को भूखा नहीं मारेगी जिसे नौकरी भी नहीं करने आती। बूढ़े मां-बाप ने मास्टर साहब को कोसने में कोई कसर नहीं उठा रखी। बाप ने कहा-
-’’बेटा, आपने घर में दिया जलाकर ही मंदिर में जलाया जाता है। आप सुखी जग सुखी।’’
मां ने भी समझाया कि दुनिया को सुधारने के लिए बहुत-से लोग हैं लेकिन अपने घर का वह अकेला ही है जिसको केवल वही देख सकता है।
सुबह होते-होते ही , मास्टरसाहब के लबों को आजादी का अर्थ समझ में आ गया। लब तो आजाद हैं लेकिन पेट ! अगले महीने से आधा वेतन, उसके बाद, यदि विधायक महोदय की कृपा बनी रही तो वेतन साफ। जांच होगी कि नौकर ने मालिक के खिलाफ आवाज क्यों उठाई ? क्या एक नौकर की इतनी औकात होनी चाहिए कि वह मालिक की नीतियों पर सवाल खड़े करे। दरअसल छप्पन सिंह ने किताबें उल्टी पढ़ ली थीं। उनको मालूम ही नहीं था कि सत्ता के साथ चलने का नाम ही नौकरी है। आम आदमी होने के लिए आदमी को पहले आम होना पड़ता है अर्थात् कटने और लुटने के लिए तैयार। छप्पन सिंह के पास अब एक ही रास्ता बचा था कि विधायक जी की शरण में जाकर, जूतारज लें और समस्त पापों से मुक्ति की प्रार्थना करें।
शाम होते-होते, मास्टर छप्पन सिंह विधायक जी के सामने हाज़िर थे। विधायक जी एरिये के सबसे अधिक दयालू आदमी थे। आदमी कहना भी उनका अपमान ही है, देवता थे, देवता। एकदम चैबीस कैरेेट के देवता, उन्होंने एक साधारण अपराधी से उठकर, विधानसभा की सीट गही थी लेकिन कभी इसबात का घमंड नहीं किया था। एरिये के सभी गुंडे आज भी उनके चरणों में अपना कट्टा डाल जाते थे लेकिन विधायक जी ने कभी इसबात का गुरूर नहीं किया था। विनम्रता तो मानो उनके सिर पर चैबीस घंटे सवार रहती थी। उन्होंने मास्टर साहब को नीचे से ऊपर तक देखा और बोले-
-’’ देखने में तो आप अक्लमंद आदमी लगते हैं फिर आजादी का अर्थ क्यों नहीं समझ पाये?’’
-’’ जी मेरी मूर्खता थी। ’’
-’’ वह तो दिख ही रहा है। देखिये, श्रीमान छप्पन बाबू, राजाओं ने गद््दी किसको सौंपी थी?’’
-’’ अंग्रेजों को।’’
-’’ और अंग्रेजों ने सत्ता किसको सौंपी ?’’
-’’ राजनेताओं को।’’
-’’ फिर आप कैसे आजाद हो गये ? सत्ता जिसकी शक्ति उसकी। सीधा-सा गणित है मास्टर साहब फिर भी आप चले अखबारों के माध्यम से हमारी छवि चमकाने। आपने एकबार भी सोचा! कि जो भक्त हमें एक डाॅन के रूप में देखते हैं। उनको जब पता लगेगा कि हम बच्चों को पिटवाने वाला छोटा-सा काम करने लगा हैं तो उनके दिल किस कदर टूटेगा। उजागर ही करना है तो कोई बड़ा-सा घोटाला उजागर कीजिये ताकि आपका और हमारा, दोनों का भला हो।’’
-’’ हमारी आपसे कोई दुश्मनी नहीं है, साहब। हम तो आपके राज में एक छोटे से स्कूल बेहद छोटे-से मास्टर हैं। बस, बेरोजगारी का ख्याल आ गया था ?’’
-’’ तभी तो कहा न कि आपने किताबें उल्टी पढ़ी हैं। कुत्ता अगर भूखा न हो तो दुम क्यों हिलाये ? बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, भुखमरी, कालाबाजारी, ये सब तो हमारी ताकतें हैं श्रीमान। सबलोग सुखी हो जायेंगे तो नेतागिरी की जरूरत ही खत्म हो जायेगी। किसान और नौजवान यूज करने के लिए ही होते हैं। उनको आप जितना जरूरतमंद रखेंगे, उतने ही वफादार होंगे। पेट भर गया तो आंदोलन करेंगे। हम कल यही देखने यूनिवर्सिटी गये थे कि हमसे गलती कहां हो गई। हमने पाया कि छात्र नेताओं की हमने उचित कीमत नहीं लगाई थी। आज समझौता हो गया। घाटे में कौन है आपको पता ही होगा।’’
मास्टर छप्पन सिंह जमीन की ओर ताकते रहे कि उन्होंने नागरिक शास्त्र की किताबें उल्टी क्यों पढ़ ली। नेताजी फिर बोले-
-’’ एक ओर आप और दूसरी ओर वह अखबार जो मेरे खिलाफ आलेख छाप रहा था। संपादक तो कल ही आकर, अपनी कलम हमारे चरणों में चढ़ा गया है। आज उसने भूल सुधार छाप दिया है। आपका इंतजार था। वह भी पूरा हो गया। हमारा तो काम ही आपलोगों का कल्याण करना है। जन सेवक हैं। आपकी भी सेवा करेंगे। सबका कल्याण ही हमारा लक्ष्य है।’’
मास्टरसाहब खुशी-खुशी घर आ गये।
शशिकांत सिंह ’शशि ’
जवाहर नवोदय विद्यालय
सुखासन मनहारा, मधेपुरा, 852128 बिहार
7387311701