यह रचना रेडियो स्पाइस शिकागो ( यु एस ए) से प्रसारित हुई बीते रविवार अर्थात 3.4.2016 को.....................
मूर्ख होते नहीं बनाये जाते हैं
व्यंग्य
जी हां, मूर्ख होते नहीं बनाये जाते हैं। आदमी अक्लमंद पैदा होता है और संसार उसे मूर्ख बानने पर तुला रहता है। लाख सावधानियों के बावजूद हर आदमी रोज औसतन दो बार मूर्ख जरूर बनता है। बनना ही पड़ेगा क्योंकि अक्लमंदों की दुनिया है। राजनीति को छोड़ दीजिये जहां अक्लमंदों का एक कुनबा, प्रत्येक पांच साल पर, कभी-कभी बीच में भी निकल पड़ता हैं, देश के मूर्खीकरण के लिए। वह संसार भर की मूर्खता अपने चेहरे पर मलकर; हाथ जोड़े अपने भक्तों के साथ; गली-गली घूमता है। मंचों पर चढ़कर अक्लमंदी भरे भाषण देता है ताकि सुनने वालों पर मूर्खता के रंग चढ़ सके। उसे पता है कि यदि वह एक महीने मूर्ख बनकर घूमता रहेगा तो अगले उनसठ महीने सबको मूर्ख बनाने में सफल हो जायेगा।
राजनीति के बाद सबसे अव्वल कलाकाकर मिलते हैं बाजार में। बाजार तो हमेशा अपनी इस कला पर इतराता है। बाजार में जब कबीर दास तक को लुकाठी निकालनी पड़ गई जिनके पास केवल एक कंबल था तो आप और हम चीज ही क्या हैं ? बाजार में आपकी मूर्खता को उकसाकर आपको बुलाया जाता है। मनुष्य के अंदर विद्यमान मूर्खता को उकसाना ही बाजार के कत्र्तव्य हैं। बाबाओं और बापूओं की चर्चा करना तो मूर्खता की श्रेणी में आ जायेगा क्योंकि उनके पास संसार को मूर्ख बानने का काॅपीराईट है। कोई प्रवचन दे रहा है। टी वी पर लाल रुमाल और काली पगड़ी बता रहा है तो कोई तेल-चीनी अपने ब्रांड की बेचकर करोड़ो कमा रहा है। कई तो सांसद और मंत्री तक हो जाते हैं अध्यात्म के बल पर । एक बाबा तो कृष्ण के बकायदा अवतार ही थे। कारगार में सुशाभित हो रहे हैं। उन्हें अर्थात बाबाओं को हक है हमें बेवकूफ बनाने का क्योंकि हम उनके चरणों में जाकर प्रार्थना करते हैं कि स्वामी हमें मूर्ख बनाइये।
यहां आधुनिक मशीनों से दांत की सफाई की जाती है। यह विज्ञापन तो आपने भी देखा ही होगा। आप नहीं फंसे पर हम एक बार जा घुसे अपने दंातों की सफाई कराने। अंदर एक देवी जी अपने औजार तेज करके दांतों पर चढ़ दौड़ीं। वही अकबर के जमाने की रेतियां थीं। हमने दरियाफ्त की कि ये मशीनें नहीं हैं तो बोली- हर चीज एक मशीन है। काम को आसान बनाना ही मशीन का काम है। हम पुनः गिड़गिड़ाये कि ये आधुनिक नहीं हैं तो बोली- आधुनिकता तो सोच में होनी चाहिए। यानी हमारे दांत उन्हीं पुरानी रेतियों से घिसे गये। यह दांतों की बात नहीं है। बड़े-बड़े अस्पतालों के बाहर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा मिलेगा-’ अनुभवी और दक्ष डाॅक्टरों की टीम, आधुनिक सुविधाओं से युक्त, चैबीस घंटे सुविधा उपलब्ध।’ आप समझते हैं कि यह विज्ञापन आपके लिए है दसअसल इस पंक्ति में से काॅमा हटाकर देखिये। सारी बातें डाॅक्टरों के लिए हैं। मरीज फंसता है। यह है असली कला। विद्यालयों की ऊंची-ऊंची बिल्डिंग देखकर, हम और आप अपने बच्चे वहां भेजने लगते हैं। पंपलेट, जो फी भरते समय मिलता है, फर्माता है- कंप्युटर की सुविधा, आॅडियो और विडियो माध्यम से बच्चों को शिक्षा दी जाती है, पूर्णतः अंग्रेजी माध्यम, अनुभवी शिक्षक। बच्चे गये तो मिलेगा कंप्युटर के नाम पर पांच सिस्टम , वह भी प्रथम जेनरेशन का, आॅडियो-विडियो के नामपर सी डी और केसेट। बदले में महीने के पांच हजार। हर्रे लगे न फिटकरी और रंग चोखा।
मूर्ख बनना और बनाना निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। इसका सीधा संबंध अप्रेल से से नहीं है। अप्रेल के एक दिन के अलावा भी मूर्ख बनाने के मौसम होते हैं। सच्चा साधक तो कभी भी किसी को मूर्ख बना सकता है लेकिन मौसम विशेष में तो आदमी स्वयं मूर्ख बनने को ललायित रहता है। उन दिनों मूर्ख बनाना आसान हो जाता है। यह मौसम शुरू होता है अक्तूबर-नवम्बर में जब, बाजार आपको त्योहारों के नाम पर नाना प्रकार की छूट दे रहा होता है। दीवाली बंपर, दशहरा स्पेशल, अक्षय तृतीया की छूट, एक हजार की साड़ी केवल पांच सौ में। ड्रेस पर स्पेशल छूट। ऐसे स्लोगनों से बाजार पटा रहता है यानी जाल बिछा रहता है। हमें मालूम है कि शिकारी आयेगा जाल बिछायेगा, फंसना नहीं है लेकिन जा फंसते हैं। बड़े-बड़े माॅल हैं जहां बड़े-बड़े हार्डिंग लगे रहते हैं। हम सपिरवार जाकर कटते हैं। यही असली कला का आनंद है जब कलाकार अपने शिकार के पास जाये नहीं बल्कि शिकार खुद चलकर आये और गर्दन झुकाकर कहे-तुभ्याम समप्र्यामि । ऐसे ही महान कलाकारों की शान में मूर्खता का एक दिन निश्चित किया गया है।
शशिकंात सिंह ’शशि’
जवाहर नवोदय विद्यालय शंकरनगर नांदेड़ महाराष्ट्र, 431736
मोबाइल-7387311701
इमेल-skantsingh28@gmail.com
मूर्ख होते नहीं बनाये जाते हैं
व्यंग्य
जी हां, मूर्ख होते नहीं बनाये जाते हैं। आदमी अक्लमंद पैदा होता है और संसार उसे मूर्ख बानने पर तुला रहता है। लाख सावधानियों के बावजूद हर आदमी रोज औसतन दो बार मूर्ख जरूर बनता है। बनना ही पड़ेगा क्योंकि अक्लमंदों की दुनिया है। राजनीति को छोड़ दीजिये जहां अक्लमंदों का एक कुनबा, प्रत्येक पांच साल पर, कभी-कभी बीच में भी निकल पड़ता हैं, देश के मूर्खीकरण के लिए। वह संसार भर की मूर्खता अपने चेहरे पर मलकर; हाथ जोड़े अपने भक्तों के साथ; गली-गली घूमता है। मंचों पर चढ़कर अक्लमंदी भरे भाषण देता है ताकि सुनने वालों पर मूर्खता के रंग चढ़ सके। उसे पता है कि यदि वह एक महीने मूर्ख बनकर घूमता रहेगा तो अगले उनसठ महीने सबको मूर्ख बनाने में सफल हो जायेगा।
राजनीति के बाद सबसे अव्वल कलाकाकर मिलते हैं बाजार में। बाजार तो हमेशा अपनी इस कला पर इतराता है। बाजार में जब कबीर दास तक को लुकाठी निकालनी पड़ गई जिनके पास केवल एक कंबल था तो आप और हम चीज ही क्या हैं ? बाजार में आपकी मूर्खता को उकसाकर आपको बुलाया जाता है। मनुष्य के अंदर विद्यमान मूर्खता को उकसाना ही बाजार के कत्र्तव्य हैं। बाबाओं और बापूओं की चर्चा करना तो मूर्खता की श्रेणी में आ जायेगा क्योंकि उनके पास संसार को मूर्ख बानने का काॅपीराईट है। कोई प्रवचन दे रहा है। टी वी पर लाल रुमाल और काली पगड़ी बता रहा है तो कोई तेल-चीनी अपने ब्रांड की बेचकर करोड़ो कमा रहा है। कई तो सांसद और मंत्री तक हो जाते हैं अध्यात्म के बल पर । एक बाबा तो कृष्ण के बकायदा अवतार ही थे। कारगार में सुशाभित हो रहे हैं। उन्हें अर्थात बाबाओं को हक है हमें बेवकूफ बनाने का क्योंकि हम उनके चरणों में जाकर प्रार्थना करते हैं कि स्वामी हमें मूर्ख बनाइये।
यहां आधुनिक मशीनों से दांत की सफाई की जाती है। यह विज्ञापन तो आपने भी देखा ही होगा। आप नहीं फंसे पर हम एक बार जा घुसे अपने दंातों की सफाई कराने। अंदर एक देवी जी अपने औजार तेज करके दांतों पर चढ़ दौड़ीं। वही अकबर के जमाने की रेतियां थीं। हमने दरियाफ्त की कि ये मशीनें नहीं हैं तो बोली- हर चीज एक मशीन है। काम को आसान बनाना ही मशीन का काम है। हम पुनः गिड़गिड़ाये कि ये आधुनिक नहीं हैं तो बोली- आधुनिकता तो सोच में होनी चाहिए। यानी हमारे दांत उन्हीं पुरानी रेतियों से घिसे गये। यह दांतों की बात नहीं है। बड़े-बड़े अस्पतालों के बाहर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा मिलेगा-’ अनुभवी और दक्ष डाॅक्टरों की टीम, आधुनिक सुविधाओं से युक्त, चैबीस घंटे सुविधा उपलब्ध।’ आप समझते हैं कि यह विज्ञापन आपके लिए है दसअसल इस पंक्ति में से काॅमा हटाकर देखिये। सारी बातें डाॅक्टरों के लिए हैं। मरीज फंसता है। यह है असली कला। विद्यालयों की ऊंची-ऊंची बिल्डिंग देखकर, हम और आप अपने बच्चे वहां भेजने लगते हैं। पंपलेट, जो फी भरते समय मिलता है, फर्माता है- कंप्युटर की सुविधा, आॅडियो और विडियो माध्यम से बच्चों को शिक्षा दी जाती है, पूर्णतः अंग्रेजी माध्यम, अनुभवी शिक्षक। बच्चे गये तो मिलेगा कंप्युटर के नाम पर पांच सिस्टम , वह भी प्रथम जेनरेशन का, आॅडियो-विडियो के नामपर सी डी और केसेट। बदले में महीने के पांच हजार। हर्रे लगे न फिटकरी और रंग चोखा।
मूर्ख बनना और बनाना निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। इसका सीधा संबंध अप्रेल से से नहीं है। अप्रेल के एक दिन के अलावा भी मूर्ख बनाने के मौसम होते हैं। सच्चा साधक तो कभी भी किसी को मूर्ख बना सकता है लेकिन मौसम विशेष में तो आदमी स्वयं मूर्ख बनने को ललायित रहता है। उन दिनों मूर्ख बनाना आसान हो जाता है। यह मौसम शुरू होता है अक्तूबर-नवम्बर में जब, बाजार आपको त्योहारों के नाम पर नाना प्रकार की छूट दे रहा होता है। दीवाली बंपर, दशहरा स्पेशल, अक्षय तृतीया की छूट, एक हजार की साड़ी केवल पांच सौ में। ड्रेस पर स्पेशल छूट। ऐसे स्लोगनों से बाजार पटा रहता है यानी जाल बिछा रहता है। हमें मालूम है कि शिकारी आयेगा जाल बिछायेगा, फंसना नहीं है लेकिन जा फंसते हैं। बड़े-बड़े माॅल हैं जहां बड़े-बड़े हार्डिंग लगे रहते हैं। हम सपिरवार जाकर कटते हैं। यही असली कला का आनंद है जब कलाकार अपने शिकार के पास जाये नहीं बल्कि शिकार खुद चलकर आये और गर्दन झुकाकर कहे-तुभ्याम समप्र्यामि । ऐसे ही महान कलाकारों की शान में मूर्खता का एक दिन निश्चित किया गया है।
शशिकंात सिंह ’शशि’
जवाहर नवोदय विद्यालय शंकरनगर नांदेड़ महाराष्ट्र, 431736
मोबाइल-7387311701
इमेल-skantsingh28@gmail.com