मुर्गाबाड़ा
व्यंग्य
एक था मुर्गाबाड़ा। उसमें साठ मुर्गे और एक आदमी थे। मुर्गे तो घटते-बढ़ते रहते थे लेकिन आदमी एक ही था। फिलहाल, एक आदमी साठ मुर्गों का मालिक था। वह उनके खाने-पीने की व्यवस्था करता था जिसकी कीमत मुर्गे अपनी जान देकर चुकाते थे। अत्यंत शांति और सौहार्द्रपूर्ण वातावरण में व्यवस्था चल रही थी। अलग-अलग रंग और ढंग के मुर्गे थे। लाल मुर्गे अपने-आपको काले मुर्गों से बेहतर मानते थे। उनकी नजर में काले मुर्गे स्वभाव से ही दुष्ट होते हैं। बेवजह चोंच मारने की उनकी प्रवृत्ति समाज के विकास में बाधक है। लाल मुर्गे चाहते तो थे कि उनको सभ्यता सीखा दें लेकिन काले मुर्गे बहुसंख्यक थे। मजबूरन लाल मुर्गों को भी मुस्कराना पड़ता था। आदमी रोज बाड़े से एक या दो मुर्गे लेकर जाता था। उनको काटकर ग्राहकों से बेच देता था। वह संतोषी जीव था। इतने से ही संतोष कर लेता था। लालच पाप का मूल है। यह वाक्य उसने मुर्गाबाड़े के गेट पर लिखकर लगाया था। दुकान की दीवार पर लिखा था-संतोषं परम् सुखम्।
मुर्गाबाड़े की शांति पर असर तब पड़ा जब एक उजला मुर्गा बाड़े में आया। वह संत प्रवृत्ति का होने के कारण अपनी गर्दन अकड़ाकर चलता था। उसकी चाल से प्रभावित होकर दो चार लाल मुर्गे उसके दोस्त बन गये और देखते ही देखते अनुयायी हो गये। काले मुर्गे पहले तो दूर-दूर ही रहे लेकिन धीरे-धीरे उनका भय भी जाता रहा और वे भी सफेद मुर्गे की बंाग पर आने लगे। अर्थात सफेद मुर्गा उस बाड़े का नेता बन गया। आदमी की नजर में भी यह सबकुछ था लेकिन उसे भला क्या फर्क पड़ने वाला था। उसे तो बस दो मुर्गे रोज चाहिए थे। दस-पंन्द्रह दिनों के बाद दूसरे चूजे लाकर छोड़ भी देता था। एक दिन सफेद मुर्गा बाड़े कें अंदर एक पत्थर पर चढ़ गया और जोर-जोर से बांग देने लगा। सारे मुर्गे एकत्र हो गये। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक इस बंाग का क्या मतलब। सफेद मुर्गा भाषण देने लगा-
-’’ दोस्तों ! आखिर कब तक हम आदमी के अत्याचार सहेंगे। एक अकेला आदमी हम साठ-सत्तर मुर्गों का मालिक है। यदि हम चोंच से भी मारें तो यह भाग खड़ा होगा। इसकी हिम्मत नहीं होगी अंदर आने की। हममें इतनी एकता नहीं है। हम गुलाम मानसिकता के हैं। यही कारण है कि संसार में सबसे अधिक हमें काटा जाता है। दोस्तों अब बगावत होगा। क्रांति होगी। ’’
बेलते-बोलते उसकी कलगी थोड़ी और ऊंची हो गई। उसने पूरी सभा को देखा। सुन तो सब रहे थे लेकिन समझ में किसी के नहीं आ रहा था। लाल मुर्गों को यह बात हज़म नहीं हो रही थी। भला काले मुर्गों को बचाने की क्या जरूरत है ? उनका तो जन्म ही कटने के लिए होता है। लाल मुर्गों ने अपनी नाराजगी जाकर सफेद मुर्गे को शाम में बताई। लाल मुर्गे के सरदार ने झल्लाये स्वर में कहा-
-’’ आप भी हद करते हैं। काले मुर्गों और लाल मुर्गों की बराबरी कैसे हो सकती है ? हमारी कलगी उनसे लंबी है। हमारी काठी भी उनसे बेहतर है। हमारी और उनकी दोस्ती कभी नहीं हो सकती। आप चाहे जो कर लें।’’
-’’ हद हो गई यार। बारी-बारी से सब कटोगे लेकिन आपस में प्रेम से नहीं रहोगे। तुम्हें क्या लगता है कि आदमी जो रोज एक काले मुर्गे ले जाकर काट रहा है। लाल मुर्गों को नहीं काटेगा ? आज उसकी तो कल तुम्हारी बारी है। यह दिमागी फितूर मत पालो इससे बाहर निकलो। मिलकर संघर्ष करो।’’
-’’ दादा, यह तो नहीं हो सकता। हम इन काले मुर्गों को सबक सिखाकर मानेंगे। इन्हें इतनी भी तमीज नहीं है कि सुबह हमसे पहले बांग न दें। अजी हमारी परम्परा रही है। हमलोग पहले बांग देते रहे हैं। आजकल के काले चूजे हमारा यह हक भी छीनने चले हैं। इनकी तो ऐसी की तैसी। दादा आप बीच में मत बोलिये। ’’
सफेद मुर्गा सोचने लगा। क्या यही सदियों तक चलेगा। आदमी कब तक अपने स्वार्थ के लिए मुर्गों को काटेगा ? उसने काले मुर्गों को भी समझाया-
-’’ मित्रों, शांति जिस भाव मिले लेनी चाहिए। यदि लाल मुर्गे केवल इसी बात से संतुष्ट हो जाते हैं कि तुम बाद में बांग दो तो क्या फर्क पड़ता है। बाद में ही दो। आदमी बनने की कोशिश मत करो। हर बात पर लड़ाई करना मुर्गों को शोभा नहीं देता। सोचो यह एकलौता आदमी कैसे अपनी आदतों से बाज आयेगा। मुर्गाकुल की जान कैसे बचेगी? तुमदोनों बैठकर शांतिवात्र्ता करो।’’
काले मुर्गों की समझ में सारी बात आ गई। एक बार फिर से शांति की जिम्मेवारी काले मुर्गों को ही। यानी हमारा जन्म ही हुआ है इन लाल मुर्गों के जुल्म सहने के लिए। आदमी तो एकबार ही मारता है। लाल मुर्गें तो रोज ही अपमानित करते हैं। मारते हैं। इनको तो सबका सिखाना ही होगा। प्रकट में उन्होंने सफेद मुर्गे के प्रस्ताव का जवाब नहीं दिया। उनके नेता ने एक जोर की बांग दी और उड़कर एक ऊंचे पत्थर पर चढ़ गया। वहीं से जोर-जोर से बांग देने लगा जो एक प्रकार से आजादी की ही घोषणा थी। लाल मुर्गों ने इसे हिमाकत के रूप में देखा और वे भी आ गये। उन्होंने भी सामने वाली पत्थर पर चढ़कर जोर का बांग दिया। फिर क्या था। दोनों दल भिड़ गये। देखते ही देखते , किसी के पंखु नुचे, किसी के पांव। किसी की आंख फूटी तो किसी का गर्दन में मोच आई। आदमी दौड़ा हुआ आया। उसने आते ही मुर्गों को हड़काया और शांति बहाल हो गईं।
सफेद मुर्गा इतनी आसानी से हार मानने वाला नहीं था। उसने लाल मुर्गे और काले मुर्गे की मीटिंग कराई। एक काॅमन मीनिमम प्रोगा्रम बन गया। सबने मिलकर तय किया कि अब एक भी मुर्गा नहीं कटेगा। यदि किसी मुर्गे को खींचने की कोशिश की जाये तो सब एक साथ आदमी पर हमला कर दें। उसे चोंच से मार-मार कर लहूलुहान कर दिया जाये। मुर्गे तैयार थे। अगले दिन आदमी आया और उसने एक लाल मुर्गे को पकड़कर ले जाने की जैसे ही कोशिश की सारे मुर्गे टूट पड़े। आदमी घबराया। भागा। उसे उम्मीद नहीं थी कि आदमी वाली हरकतें मुर्गे भी कर सकते हैं। वह लाचार था। यदि मुर्गों को मारता तो उसको घाटा होता। पूंजी लगी थी। मुर्गे एकबार में मर गये तो नुकसान ठीक-ठाक हो जायेगा। होली भी आने वाली थी। होली पर मुर्गो की बिक्र बढ़ जाती है। आदमी चाहता था कि अभी एक-दो मुर्गे ही बेचे और सीजन में एक साथ सारे बेच दे। शादी-व्याह के सीजन भी आ रहे थे। वह मुर्गों को मार नहीं सकता था। भगना पड़ा। आदमी का बच्चा था। उसने हार नहीं मानी। मुर्गों की बोली समझने की कोशिश करता रहा। दस दिनों में ही वह मुर्गो की भाषा बोलने लगा। वह छुपकर मुर्गो की बातें सुनता। उधर मुर्गे काफी जोश में थे। उन्हें लगा रहा था कि मुर्गाबाड़ा पर कब्जा हो गया है।
आदमी की नज़र उस सफेद मुर्गे पर थी। वह प्रायः देखता कि वह मुर्गा किसी न किसी समूह में बातें कर रहा हैं। आदमी का बच्चा था। समझते देर नहीं लगी कि नेता बनने की कोशिश है। सारे फरसाद की जड़ वही है। उसने नई चाल चली। सफेद मुर्गे को अपने घर ले गया। उसे ताजी मक्की के दाने खिलाये। तले हुये मुड़मुड़े खाकर मुर्गे के मन में वैराग्य का संचार हो गया। वह सोचने लगा -संसार क्या है! माया ही माया है। आदमी इतनी मुश्किल से अपने लिए माल असबाब जमा करता है फिर छोड़कर चला जाता है। उनसे तो हम मुर्गे ही ठीक हैं। हमारा जीवन तो संसार के काम आता है। हम किसी की भूख मिटाने के काम आते हैं। हम मनुष्य से श्रेष्ठ हैं। आज नही ंतो कल मरना तो सबको है फिर टंटा किस बात का। जो जितना पहले जायेगा उतनी कम पीड़ाओं का सामना करना पड़ेगा।’ आदमी ने मुर्गे को मीठा पेय पिलाया। रूह-आफ़ज़ा पीकर मुर्गे की रूह एकदम सुफियाना हो गई। वह सोचने लगा आदमी कितना महान होता है। वह मुगों को हर मुसीबत से आज़ाद करता है। उनको जीवन भर पालता है। दाने खिलाता है। यदि आदमी न पाले तो मुर्गे सड़क पर भटक कर मर जायें। मालिक के काम आना ही मुर्गाधर्म है। मुर्गे को चाहिए कि मालिक की मर्जी को ही आदेश समझे। वह भावुक हो रहा था। आखों से आंसू गिरने लगे। आदमी समझ गया कि नशा तरी हो गया है। उसने कहा-
-’’ मुर्गे भाई।’’
पहली बार किसी आदमी ने किसी मुर्गे को भाई कहा था। मुर्गा भावुक होकर जोर-जोर से बांग देने लगा। वह अपनी जान कुर्बान करने को आतुर हो रहा था। आदमी ने आगे कहा-
-’’ दोस्त, तुम्हें क्या लगता है कि मुर्गों को काटना हमारे लिए इतना आसान काम है ? जिन मुर्गो को हम बचपन से खिलाते-पिलाते हैं। उनके बीमार होने पर इलाज कराते हैं। उनकी सुख-सुविधा का हरदम ख्याल रखते है। उन्हें हम काटते हैं तो हमें कितनी पीड़ा होती होगी।’’
-’’ मैं समझ सकता हूं सर। आपकी तकलीफ मैं समझ रहा हूं। मुर्गों ने जो गलती की हैं। उसके लिए मैं शर्मिंदा हूं। मैं उन्हें समझा-बुझाकर सही राह पर लाऊंगा। आप मेरी जिम्मेवारी पर तीन दिनों के बाद मुर्गाबाड़ा तशरीफ लायें।’’
आदमी ने मुर्गे को और स्वादिष्ट व्यंजन चखाये। चलते समय उसने मुर्गे को एक रेशमी रूमाल ओढ़ने के लिए दिया जिसे ओढ़कर मुर्गा अपने को आदमी समझने लगा। उसे दुःख हो रहा था कि उसने आदमी को ठेस पहुंचाई। मुर्गा जब बाड़े में पहुंचा, उसकी चाल ही बदल गई थी। उसे सारे के सारे मुर्गे तुच्छ और ज़ाहिल लग रहे थे। ये ससुर जीकर क्या करेंगे। इन्हें कौन सा डाॅक्टर या इंजीनियर बनना है। भूख से मरने से तो बेहतर है कि मालिक के लिए जान दे दें। बेवजह सुबह की नींद खराब करते हैं और क्या ? सुबह काले मुर्गे जल्दी उठे और बांग देने लगे। लाल मुर्गे भी आ गये। उन्होंने मुंह खोलने की कोशिश की लेकिन बाजी काले मुर्गे मार गये। मामला एकबार फिर तनावपूर्ण हो गया। लाल मुर्ग भागे हुये गये सफेद मुर्गे के पास।
-’’ आपके कहने के अनुसार हम सुबह नियत समय पर बांग देने आये लेकिन काले मुर्गों ने फिर बदतमीजी की। वे बांग देने लगे। उन्होंने समझौते की शर्तांे का उल्लंघन किया है। अब हम उन्हें छोड़ने वाले नहीं हैं। क्या कहते हैं आप ?’’
मुर्गे ने अपनी कलगी सीधी की। हवा में मुंह उठाकर सोचता रहा। धीरे से दो बार कूं कूड़कू करके बोला-
-’’ हमने भी इस विषय पर घनघोर चिंतन किया है। पूर्वजों ने जो परिपाटी चलाई है। कुछ सोचकर ही चलाई होगी। काले मुर्गे सुधरने वाले नहीं है। उनका मन बहुत बढ़ गया है। हम तो केवल यह चाहते थे कि सभी मुर्गे आपस में शांति से रहें । सबका विकास हो लेकिन मेरे चाहने न चाहने से क्या होगा ? उनकी नियत में ही खोट है।’’
लाल मुर्गे वहां से चले तो अकड़ से टेढ़े हो रहे थे। काले मुर्गो में भी यह खबर फैल गई थी कि लाल वाले नेताजी से सलाह लेने गये हैं। उन्हें पूरा विश्वास था कि मामला सुलट जायेगा लेकिन उनको जो खबर मिली वह खतरनाक थी। उन्होंने भी नेताजी की सलाह लेने की ठानी और पहुंच गये सफेद मुर्गे के पास। मामला सुनकर सफेद मुर्गा भावुक हो गया। उसने कहा-
-’’ दोस्त, मांगने से केवल भीख मिलती है अधिकार नहीं। हमारी तो इच्छा केवल यह थी कि मुर्गासमाज में शांति रहे। सबका विकास हो सबका साथ बना रहे लेकिन हमारे और आपके चाहने से क्या होगा। हानि,लाभ,जीवन,मरण, यश-अपयश विधि हाथ। जीवन से सम्मान बड़ा है। आप पर कोई दबाव नहीं हैं यदि वे लोग समझौते को नहीं मानते तो आप भी स्वतंत्र हैं। मैं तो ईश्वर से यही प्रार्थना करूंगा कि शांति बनी रहे।’’
मुर्गाबाड़ा में मुर्गो के बीच एकबार फिर निर्णायक जंग हुई लेकिन बाजी छुटी आदमी के हाथ। उसने घायल मुर्गों को मारकर बेच दिया। अब एक बार फिर मुर्गाबाड़ा में शांति स्थापित हो गई है। आदमी आता है एक या दो मुर्गे ले जाता है। ग्राहकों को दे देता है। विरोध कोई नहीं करता। क्यों करे ? लाल मरें तो काले वाले को क्या ? और काले वाले मरें तो लाल वाले को क्या ? हां, इस बीच सफेद मुर्गा नहीं दिख रहा । एकबार आदमी के घर गया था तो लौटकर नहीं आया। भगवान उसकी आत्मा को शांति दे।
शशिकंात सिंह ’शशि’
जवाहर नवोदय विद्यालय शंकरनगर नांदेड़ महाराष्ट्र, 431736
मोबाइल-7387311701
इमेल- ेांदजेपदही28/हउंपसण्बवउ
व्यंग्य
एक था मुर्गाबाड़ा। उसमें साठ मुर्गे और एक आदमी थे। मुर्गे तो घटते-बढ़ते रहते थे लेकिन आदमी एक ही था। फिलहाल, एक आदमी साठ मुर्गों का मालिक था। वह उनके खाने-पीने की व्यवस्था करता था जिसकी कीमत मुर्गे अपनी जान देकर चुकाते थे। अत्यंत शांति और सौहार्द्रपूर्ण वातावरण में व्यवस्था चल रही थी। अलग-अलग रंग और ढंग के मुर्गे थे। लाल मुर्गे अपने-आपको काले मुर्गों से बेहतर मानते थे। उनकी नजर में काले मुर्गे स्वभाव से ही दुष्ट होते हैं। बेवजह चोंच मारने की उनकी प्रवृत्ति समाज के विकास में बाधक है। लाल मुर्गे चाहते तो थे कि उनको सभ्यता सीखा दें लेकिन काले मुर्गे बहुसंख्यक थे। मजबूरन लाल मुर्गों को भी मुस्कराना पड़ता था। आदमी रोज बाड़े से एक या दो मुर्गे लेकर जाता था। उनको काटकर ग्राहकों से बेच देता था। वह संतोषी जीव था। इतने से ही संतोष कर लेता था। लालच पाप का मूल है। यह वाक्य उसने मुर्गाबाड़े के गेट पर लिखकर लगाया था। दुकान की दीवार पर लिखा था-संतोषं परम् सुखम्।
मुर्गाबाड़े की शांति पर असर तब पड़ा जब एक उजला मुर्गा बाड़े में आया। वह संत प्रवृत्ति का होने के कारण अपनी गर्दन अकड़ाकर चलता था। उसकी चाल से प्रभावित होकर दो चार लाल मुर्गे उसके दोस्त बन गये और देखते ही देखते अनुयायी हो गये। काले मुर्गे पहले तो दूर-दूर ही रहे लेकिन धीरे-धीरे उनका भय भी जाता रहा और वे भी सफेद मुर्गे की बंाग पर आने लगे। अर्थात सफेद मुर्गा उस बाड़े का नेता बन गया। आदमी की नजर में भी यह सबकुछ था लेकिन उसे भला क्या फर्क पड़ने वाला था। उसे तो बस दो मुर्गे रोज चाहिए थे। दस-पंन्द्रह दिनों के बाद दूसरे चूजे लाकर छोड़ भी देता था। एक दिन सफेद मुर्गा बाड़े कें अंदर एक पत्थर पर चढ़ गया और जोर-जोर से बांग देने लगा। सारे मुर्गे एकत्र हो गये। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक इस बंाग का क्या मतलब। सफेद मुर्गा भाषण देने लगा-
-’’ दोस्तों ! आखिर कब तक हम आदमी के अत्याचार सहेंगे। एक अकेला आदमी हम साठ-सत्तर मुर्गों का मालिक है। यदि हम चोंच से भी मारें तो यह भाग खड़ा होगा। इसकी हिम्मत नहीं होगी अंदर आने की। हममें इतनी एकता नहीं है। हम गुलाम मानसिकता के हैं। यही कारण है कि संसार में सबसे अधिक हमें काटा जाता है। दोस्तों अब बगावत होगा। क्रांति होगी। ’’
बेलते-बोलते उसकी कलगी थोड़ी और ऊंची हो गई। उसने पूरी सभा को देखा। सुन तो सब रहे थे लेकिन समझ में किसी के नहीं आ रहा था। लाल मुर्गों को यह बात हज़म नहीं हो रही थी। भला काले मुर्गों को बचाने की क्या जरूरत है ? उनका तो जन्म ही कटने के लिए होता है। लाल मुर्गों ने अपनी नाराजगी जाकर सफेद मुर्गे को शाम में बताई। लाल मुर्गे के सरदार ने झल्लाये स्वर में कहा-
-’’ आप भी हद करते हैं। काले मुर्गों और लाल मुर्गों की बराबरी कैसे हो सकती है ? हमारी कलगी उनसे लंबी है। हमारी काठी भी उनसे बेहतर है। हमारी और उनकी दोस्ती कभी नहीं हो सकती। आप चाहे जो कर लें।’’
-’’ हद हो गई यार। बारी-बारी से सब कटोगे लेकिन आपस में प्रेम से नहीं रहोगे। तुम्हें क्या लगता है कि आदमी जो रोज एक काले मुर्गे ले जाकर काट रहा है। लाल मुर्गों को नहीं काटेगा ? आज उसकी तो कल तुम्हारी बारी है। यह दिमागी फितूर मत पालो इससे बाहर निकलो। मिलकर संघर्ष करो।’’
-’’ दादा, यह तो नहीं हो सकता। हम इन काले मुर्गों को सबक सिखाकर मानेंगे। इन्हें इतनी भी तमीज नहीं है कि सुबह हमसे पहले बांग न दें। अजी हमारी परम्परा रही है। हमलोग पहले बांग देते रहे हैं। आजकल के काले चूजे हमारा यह हक भी छीनने चले हैं। इनकी तो ऐसी की तैसी। दादा आप बीच में मत बोलिये। ’’
सफेद मुर्गा सोचने लगा। क्या यही सदियों तक चलेगा। आदमी कब तक अपने स्वार्थ के लिए मुर्गों को काटेगा ? उसने काले मुर्गों को भी समझाया-
-’’ मित्रों, शांति जिस भाव मिले लेनी चाहिए। यदि लाल मुर्गे केवल इसी बात से संतुष्ट हो जाते हैं कि तुम बाद में बांग दो तो क्या फर्क पड़ता है। बाद में ही दो। आदमी बनने की कोशिश मत करो। हर बात पर लड़ाई करना मुर्गों को शोभा नहीं देता। सोचो यह एकलौता आदमी कैसे अपनी आदतों से बाज आयेगा। मुर्गाकुल की जान कैसे बचेगी? तुमदोनों बैठकर शांतिवात्र्ता करो।’’
काले मुर्गों की समझ में सारी बात आ गई। एक बार फिर से शांति की जिम्मेवारी काले मुर्गों को ही। यानी हमारा जन्म ही हुआ है इन लाल मुर्गों के जुल्म सहने के लिए। आदमी तो एकबार ही मारता है। लाल मुर्गें तो रोज ही अपमानित करते हैं। मारते हैं। इनको तो सबका सिखाना ही होगा। प्रकट में उन्होंने सफेद मुर्गे के प्रस्ताव का जवाब नहीं दिया। उनके नेता ने एक जोर की बांग दी और उड़कर एक ऊंचे पत्थर पर चढ़ गया। वहीं से जोर-जोर से बांग देने लगा जो एक प्रकार से आजादी की ही घोषणा थी। लाल मुर्गों ने इसे हिमाकत के रूप में देखा और वे भी आ गये। उन्होंने भी सामने वाली पत्थर पर चढ़कर जोर का बांग दिया। फिर क्या था। दोनों दल भिड़ गये। देखते ही देखते , किसी के पंखु नुचे, किसी के पांव। किसी की आंख फूटी तो किसी का गर्दन में मोच आई। आदमी दौड़ा हुआ आया। उसने आते ही मुर्गों को हड़काया और शांति बहाल हो गईं।
सफेद मुर्गा इतनी आसानी से हार मानने वाला नहीं था। उसने लाल मुर्गे और काले मुर्गे की मीटिंग कराई। एक काॅमन मीनिमम प्रोगा्रम बन गया। सबने मिलकर तय किया कि अब एक भी मुर्गा नहीं कटेगा। यदि किसी मुर्गे को खींचने की कोशिश की जाये तो सब एक साथ आदमी पर हमला कर दें। उसे चोंच से मार-मार कर लहूलुहान कर दिया जाये। मुर्गे तैयार थे। अगले दिन आदमी आया और उसने एक लाल मुर्गे को पकड़कर ले जाने की जैसे ही कोशिश की सारे मुर्गे टूट पड़े। आदमी घबराया। भागा। उसे उम्मीद नहीं थी कि आदमी वाली हरकतें मुर्गे भी कर सकते हैं। वह लाचार था। यदि मुर्गों को मारता तो उसको घाटा होता। पूंजी लगी थी। मुर्गे एकबार में मर गये तो नुकसान ठीक-ठाक हो जायेगा। होली भी आने वाली थी। होली पर मुर्गो की बिक्र बढ़ जाती है। आदमी चाहता था कि अभी एक-दो मुर्गे ही बेचे और सीजन में एक साथ सारे बेच दे। शादी-व्याह के सीजन भी आ रहे थे। वह मुर्गों को मार नहीं सकता था। भगना पड़ा। आदमी का बच्चा था। उसने हार नहीं मानी। मुर्गों की बोली समझने की कोशिश करता रहा। दस दिनों में ही वह मुर्गो की भाषा बोलने लगा। वह छुपकर मुर्गो की बातें सुनता। उधर मुर्गे काफी जोश में थे। उन्हें लगा रहा था कि मुर्गाबाड़ा पर कब्जा हो गया है।
आदमी की नज़र उस सफेद मुर्गे पर थी। वह प्रायः देखता कि वह मुर्गा किसी न किसी समूह में बातें कर रहा हैं। आदमी का बच्चा था। समझते देर नहीं लगी कि नेता बनने की कोशिश है। सारे फरसाद की जड़ वही है। उसने नई चाल चली। सफेद मुर्गे को अपने घर ले गया। उसे ताजी मक्की के दाने खिलाये। तले हुये मुड़मुड़े खाकर मुर्गे के मन में वैराग्य का संचार हो गया। वह सोचने लगा -संसार क्या है! माया ही माया है। आदमी इतनी मुश्किल से अपने लिए माल असबाब जमा करता है फिर छोड़कर चला जाता है। उनसे तो हम मुर्गे ही ठीक हैं। हमारा जीवन तो संसार के काम आता है। हम किसी की भूख मिटाने के काम आते हैं। हम मनुष्य से श्रेष्ठ हैं। आज नही ंतो कल मरना तो सबको है फिर टंटा किस बात का। जो जितना पहले जायेगा उतनी कम पीड़ाओं का सामना करना पड़ेगा।’ आदमी ने मुर्गे को मीठा पेय पिलाया। रूह-आफ़ज़ा पीकर मुर्गे की रूह एकदम सुफियाना हो गई। वह सोचने लगा आदमी कितना महान होता है। वह मुगों को हर मुसीबत से आज़ाद करता है। उनको जीवन भर पालता है। दाने खिलाता है। यदि आदमी न पाले तो मुर्गे सड़क पर भटक कर मर जायें। मालिक के काम आना ही मुर्गाधर्म है। मुर्गे को चाहिए कि मालिक की मर्जी को ही आदेश समझे। वह भावुक हो रहा था। आखों से आंसू गिरने लगे। आदमी समझ गया कि नशा तरी हो गया है। उसने कहा-
-’’ मुर्गे भाई।’’
पहली बार किसी आदमी ने किसी मुर्गे को भाई कहा था। मुर्गा भावुक होकर जोर-जोर से बांग देने लगा। वह अपनी जान कुर्बान करने को आतुर हो रहा था। आदमी ने आगे कहा-
-’’ दोस्त, तुम्हें क्या लगता है कि मुर्गों को काटना हमारे लिए इतना आसान काम है ? जिन मुर्गो को हम बचपन से खिलाते-पिलाते हैं। उनके बीमार होने पर इलाज कराते हैं। उनकी सुख-सुविधा का हरदम ख्याल रखते है। उन्हें हम काटते हैं तो हमें कितनी पीड़ा होती होगी।’’
-’’ मैं समझ सकता हूं सर। आपकी तकलीफ मैं समझ रहा हूं। मुर्गों ने जो गलती की हैं। उसके लिए मैं शर्मिंदा हूं। मैं उन्हें समझा-बुझाकर सही राह पर लाऊंगा। आप मेरी जिम्मेवारी पर तीन दिनों के बाद मुर्गाबाड़ा तशरीफ लायें।’’
आदमी ने मुर्गे को और स्वादिष्ट व्यंजन चखाये। चलते समय उसने मुर्गे को एक रेशमी रूमाल ओढ़ने के लिए दिया जिसे ओढ़कर मुर्गा अपने को आदमी समझने लगा। उसे दुःख हो रहा था कि उसने आदमी को ठेस पहुंचाई। मुर्गा जब बाड़े में पहुंचा, उसकी चाल ही बदल गई थी। उसे सारे के सारे मुर्गे तुच्छ और ज़ाहिल लग रहे थे। ये ससुर जीकर क्या करेंगे। इन्हें कौन सा डाॅक्टर या इंजीनियर बनना है। भूख से मरने से तो बेहतर है कि मालिक के लिए जान दे दें। बेवजह सुबह की नींद खराब करते हैं और क्या ? सुबह काले मुर्गे जल्दी उठे और बांग देने लगे। लाल मुर्गे भी आ गये। उन्होंने मुंह खोलने की कोशिश की लेकिन बाजी काले मुर्गे मार गये। मामला एकबार फिर तनावपूर्ण हो गया। लाल मुर्ग भागे हुये गये सफेद मुर्गे के पास।
-’’ आपके कहने के अनुसार हम सुबह नियत समय पर बांग देने आये लेकिन काले मुर्गों ने फिर बदतमीजी की। वे बांग देने लगे। उन्होंने समझौते की शर्तांे का उल्लंघन किया है। अब हम उन्हें छोड़ने वाले नहीं हैं। क्या कहते हैं आप ?’’
मुर्गे ने अपनी कलगी सीधी की। हवा में मुंह उठाकर सोचता रहा। धीरे से दो बार कूं कूड़कू करके बोला-
-’’ हमने भी इस विषय पर घनघोर चिंतन किया है। पूर्वजों ने जो परिपाटी चलाई है। कुछ सोचकर ही चलाई होगी। काले मुर्गे सुधरने वाले नहीं है। उनका मन बहुत बढ़ गया है। हम तो केवल यह चाहते थे कि सभी मुर्गे आपस में शांति से रहें । सबका विकास हो लेकिन मेरे चाहने न चाहने से क्या होगा ? उनकी नियत में ही खोट है।’’
लाल मुर्गे वहां से चले तो अकड़ से टेढ़े हो रहे थे। काले मुर्गो में भी यह खबर फैल गई थी कि लाल वाले नेताजी से सलाह लेने गये हैं। उन्हें पूरा विश्वास था कि मामला सुलट जायेगा लेकिन उनको जो खबर मिली वह खतरनाक थी। उन्होंने भी नेताजी की सलाह लेने की ठानी और पहुंच गये सफेद मुर्गे के पास। मामला सुनकर सफेद मुर्गा भावुक हो गया। उसने कहा-
-’’ दोस्त, मांगने से केवल भीख मिलती है अधिकार नहीं। हमारी तो इच्छा केवल यह थी कि मुर्गासमाज में शांति रहे। सबका विकास हो सबका साथ बना रहे लेकिन हमारे और आपके चाहने से क्या होगा। हानि,लाभ,जीवन,मरण, यश-अपयश विधि हाथ। जीवन से सम्मान बड़ा है। आप पर कोई दबाव नहीं हैं यदि वे लोग समझौते को नहीं मानते तो आप भी स्वतंत्र हैं। मैं तो ईश्वर से यही प्रार्थना करूंगा कि शांति बनी रहे।’’
मुर्गाबाड़ा में मुर्गो के बीच एकबार फिर निर्णायक जंग हुई लेकिन बाजी छुटी आदमी के हाथ। उसने घायल मुर्गों को मारकर बेच दिया। अब एक बार फिर मुर्गाबाड़ा में शांति स्थापित हो गई है। आदमी आता है एक या दो मुर्गे ले जाता है। ग्राहकों को दे देता है। विरोध कोई नहीं करता। क्यों करे ? लाल मरें तो काले वाले को क्या ? और काले वाले मरें तो लाल वाले को क्या ? हां, इस बीच सफेद मुर्गा नहीं दिख रहा । एकबार आदमी के घर गया था तो लौटकर नहीं आया। भगवान उसकी आत्मा को शांति दे।
शशिकंात सिंह ’शशि’
जवाहर नवोदय विद्यालय शंकरनगर नांदेड़ महाराष्ट्र, 431736
मोबाइल-7387311701
इमेल- ेांदजेपदही28/हउंपसण्बवउ
पहले तो ब्लॉग लेखन के लिए हार्दिक बधाई..
जवाब देंहटाएंप्रतीकों के मार्फ़त आपने सत्ता और सियासत पर बहुत ही बढ़िया तंज किया है...
यदि कही पूर्व में प्रकाशित हुआ हो तो उसका भी उल्लेख कर दिया करें...
एक बार फिर बधाई और निरतंर लेखन के लिए शुभ कामनाएँ...
पहले तो ब्लॉग लेखन के लिए हार्दिक बधाई..
जवाब देंहटाएंप्रतीकों के मार्फ़त आपने सत्ता और सियासत पर बहुत ही बढ़िया तंज किया है...
यदि कही पूर्व में प्रकाशित हुआ हो तो उसका भी उल्लेख कर दिया करें...
एक बार फिर बधाई और निरतंर लेखन के लिए शुभ कामनाएँ...
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जवाब देंहटाएंbahu bahut dhanyawad Arvind Bhai
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