किसान और कल्याण
व्यंग्य
किसान पहले देशद्रोही नहीं थे। अन्न उपजाते थे। बदले में देश उन्हें नारे देता था। दिनरात मेहनत करते थे जिससे खुश होकर बच्चे उनपर निबंध लिखा करते थे। जीवन भर महाजनों का गल्ला भरने के बाद किसान सुखपूर्वक आत्महत्या कर लिया करता था, अमन-चैन कायम था। सरकार उनपर हमेशा खुश रहा करती थी तथा नानाप्रकार की योजनाएं बनाया करती थी जिसका पता किसानों को अखबार पढ़कर चलता था अलबत्ता अधिकारियों और बिचैलियों को पहले से पता होता था। बिचौलियों का दिन दुना और रात चैगुना विकास होता चला गया। बिचैलियों ने देखा कि उनका विकास किसानों के कारण ही हो रहा है तो उन्होंने किसानों का भला करने की योजना बनाई। दो रुपये के मक्के का दाना बीस रुपये में बेचने लगे। पांच रुपये का आलू पचास रुपये में बिकने लगा बस अंतर इतना ही था कि उन्हें प्लास्टिक की थैलियों में बंद कर दिया जाता था। प्लास्टिक की थैलियां वही होती हैं जिनपर सरकार प्रतिबंध लगाती है लेकिन इस्तेमाल करने के लिए, व्यापार करने के लिए नहीं। खेत से निकला दो रुपये का अन्न बाजार में पहुंचकर दो सौ रुपये का हो जाये तो उसे विकास कहते हैं, सरकार ने यह परिभाषा तय कर रखी थी और उसी के अनुसार विकास हो रहा था।
किसानों के कल्याण हेतु सरकार दिनरात बेचैन रहा करती थी। किसानों को सरकार की बेचैनी से डर लगता था कि कहीं सम्पूर्ण कल्याण पर न उतारू हो जाये। हुआ भी वही, व्यापारियों ने सरकार को विश्वास दिलाया कि उनके पूवर्ज भी किसान ही थे। खानदानी किसान होने के नाते उनके रगों में भी दौड़ता है किसान का खून। सरकार को व्यापारियों पर प्यार आ गया क्योंकि चुनावों के समय व्यापारियों को भी सरकार पर प्यार आया करता है। सरकार ने देखा कि व्यापारियों को किसान बनने के लिए जो जरूरी तत्व है खेत वह तो मिल ही नहीं रहा तो उन्होंने किसानों को समझाया कि खेत बिचैलियों को दे दें और मजे से मजदूरी करें। उन्हें अगर खेती करने की तलब लगे तो बिचैलियों के लिए खेती करें अर्थात खेती करें और उनके बताये दाम पर उनको दे दें। सरकार को उम्मीद थी कि किसान गदगद होकर चरण पकड़ लेगा लेकिन किसान गर्दन झुकाये खड़ा रहा। सरकार ने समझाया कि पहले तुम महजनों के गल्ले भरते थे अब कालाबाजारियों के भरो, हमने कानून बना दिया है, वह तुम्हारा सारा माल अपने गल्ले में भर लेगा। किसान कसमसाया, सरकार ने समझा
शाबाश
ी देगा लेकिन वह तनकर आंखों में देखने लगा। गड़बड़ी की आशंका सरकार को सबसे पहले हो जाया करती है क्योंकि आधी गड़बड़ी तो उनकी ही वजह से होती है सो हो गई। उन्होंने अपने पाले गये कुत्ते बुलाये और कहा-भौंको। कुत्ते भौंकने लगे लोगों को लगा पत्रकार बोल रहे हैं। लोग अपने घरों में बंद थे। उनके खिड़की दरवाजे सब बंद थे इसलिए पता ही नहीं चलता था कि पत्रकार कैसे बोलते हैं सो डर और फैल गया। कुत्ते किसानों पर टूट पड़े लेकिन किसान भी पक चुके थे। उन्होंने तय किया कि दिल्ली जाकर ही सरकार से बात करेंगे। उन्हें किसी ने बता दिया था कि सरकार जो है वह दिल्ली में पाई जाती है। चुनावों के समय तो पूरे देश में व्याप्त रहती है लेकिन उसके बाद वह दिल्ली की आबोहवा में लहलहाती है। किसानों ने दिल्ली जाने का मन बनाया तो हड़कंप मच गया। सरकार के तेवर चढ़ गये। छात्रों को कूटा लेकिन दिल्ली नहीं आये। आते भी कैसे ? जब दिल्ली में ही कूटा था। तब कितनी आसानी से उन्हें देशद्रोही कह दिया, कुत्तों ने भौंक दिया, लोगों ने मान लिया। वकीलो, मास्टरों, व्यापारियों सबको बारी-बारी से कूटा पर किसी ने दिल्ली आने की और सरकार से सवाल करने की हिम्मत नहीं दिखाई। किसान आयेंगे दिल्ली! इनकी मजाल तो देखो ! उन्होंने चिंतक बुलाये और लगा चिंतन होने की बागी किसानों के साथ किस प्रकार का व्यवहार किया जाये। अंत में, जैसा कि नियम है निष्कर्ष निकला करता है, निकला कि किसानों के साथ वही व्यवहार किया जाये जो एक दारोगा चोर के साथ करता है। एक उत्साही चिंतक ने बताया कि ठंड के मौसम को देखते हुये उनपर पानी की बौछार मारी जाये। पानी-पानी बहुत दिनों से कर भी रहे हैं, उनकी मांगें हमं पूरी नहीं करेंगे तो कौन करेगा ? सामूहिक ठहाका लगा जिससे माहौल चिंतन के योग्य हो गया। एक नौजवान चिंतक ने सुझाया कि पुलिस की लाठी चिंतारोधी होती है तो क्यों न किसानों पर पुलिस छोड़ दी जाये। पुलिस भी तो इन्हीं किसानों के बेटे हैं, खाली बैठे हैं, उनको काम मिल जायेगा। अपने बेटों के लिए रोजगार की मांग तो बहुत पहले से कर ही रहे हैं। एकबार फिर जोर का ठहाका लगा जिससे माहौल ंिचंतनमय हो गया। सरकार ने काफी गंभीरता से विचार किया और चिंतकों के सारे उपाय आजमा लिये लेकिन किसानों का मन बहुत अधिक बढ़ गया था।
सरकार और किसान में बातचीत होने लगी और जैसा कि नियम है बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकल रहा था क्योंकि नतीजा निकालने के लिए बातचीत हो ही नहीं रही थी। देश का नियम है कि यहां सारे अक्लमंद आदमी टी वी चैनल पर ही पाये जाते हैं। एक दो यदि धोखे से छूट गये तो चैनल वाले उन्हें बुला लिया करते हैं। अक्लमंद लोगों ने तहकीकात की तो पाया कि ये सारे किसान बहका कर लाये गये हैं। बहकाने वाला एक गिरोह है जो कभी छात्रों को, कभी व्यापारियों को तो कभी मजदूरों को बहका दिया करता है। पता नहीं उन्हें तब क्या हो जाता है जब देश में चुनाव हो रहे होते हैं। तब वे वोट सही आदमी को देने के लिए क्यों नहीं बहका पाते ? चैनल पर बैठे अक्लमंदों ने यह ऐलान किया कि किसान तो धोती और पगड़ी में होते हैं इसलिए ये तो किसान हैं ही नहीं। उनकी गलती भी नहीं थी उन्होंने किसान सिनेमा में देखा था और सिनेमा वालों ने किताबों में, सो जीन्स वालों को पहलीबार किसानपुत्र के रूप में देखकर चैनलिया पत्रकार घबरा गये। तभी किसी अक्लमंद को सूझा कि ये सारे के सारे दुश्मन देश के जासूस हैं और भारत में बलवा फैलाने के लिए घुस आये हैं। सारांश यह कि कि किसानों को किसान मानने के अलावा जो भी संभव था चैनलिया अक्लमंदों ने साबित कर दिया।
सरकार ने देखा कि किसान अपना कल्याण जोरशोर से कराने पर उतारू हैं तो उन्होंने गली-मुहल्लों के चुनावों को नजरअंदाज करके उनके कल्याण पर ही पूरा ध्यान देने की योजना बनाई और अर्द्ध सैनिक बल के जवानों को उनके स्वागत के लिए भेजा और उनके हाथ खोल दिये। सरकार को मालूम था कि किसानों की जय करनी है तो जवानों को ही भेजना होगा। जवान आये क्योंकि उन्हें आना ही था, नौकरी भी करनी होती है, एक और लाठी और दूसरी ओर सिर, वात्र्ता होने लगी। लाठी और सिर की वात्र्ता में जाहिर तौर पर सिर को लाठी की इज्जत करनी थी और उन्हें सिर-आंखों पर लेना ही था। संयोग से बहुत से किसानों के सिर बच गये थे तो उनको हिंसा फैलाने के जुर्म में हिरासत में ले लिया गया जहां उनको थानेदार साहब के डंडे से वात्र्ता करनी पड़ी। कमरे में बंद बुद्धिजीवी हाय-हाय करने लगे तभी सरकार ने बयान दिया कि ये लोग जिन्हें कूटा गया था किसान थे ही नहीं, ये लोग तो बहकाकर लाये गये थे। लोग पूछना चाहते थे कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों को बहकाकर दिल्ली लाया गया क्या यह सरकार की नाकामी नहीं है ? लेकिन पूछ नहीं पाये।
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