दो दुनी आठ
व्यंग्य
हलचलपुर विधानसभा के मतदाताओं ने फैसला किया था कि इस बार हर घर से एक आदमी ही मतदान के लिए जायेगा क्योंकि नेताओं के घोषणापत्र में हर घर से एक आदमी को नौकरी देने का वायदा किया गया था। नेताओं की दुनिया में हड़कंप मचा था। हर घर से एक आदमी मतदान के लिए आयेगा तो चालीस प्रतिशत से अधिक मतदान नहीं होंगे इतने कम मतदान में चालीस दलों का गुजारा कैसे होगा ? सबसे बड़ी पार्टी कम से कम बीस प्रतिशत मतों पर तो कब्जा कर ही लेगी। ऐसे में दूसरे नंबर वाले दल के हिस्से सिवा बुजुर्गों के आशीर्वाद के कुछ बचेगा नहीं। हार की चिंता नेताओं को खाये जा रही थी हर घोड़ा रेस जीतना चाहता है ताकि अगली बार उसका मालिक उस पर दांव खेल सके। पहले तो दलों ने एक दूसरे को खूब कोसा फिर और अंत में समाधान की तलाश में एकसाथ बैठ गये।
’ठल्लू पार्टी’ के नेता श्री पी के ठल्लू ने यूं तो खुद सोचने के काम बहुत पहले छोड़ दिया था। उनका मानना था कि राजनीति में दिमाग का इस्तेमाल सिवा कुर्सी हड़पने के किसी और क्षेत्र में करना समय की बरबादी है लेकिन इसबार खुद ही सोच रहे थे। ठल्लू साहब ने सोचना जैसे ही शुरू किया कि निष्कर्ष पर पहुंच गये जिसकी उम्मीद खुद उन्हें भी नहीं थी। उन्होंने तुरंत घोषणा की कि उन्होंने तय कर लिया है कि उन्हें क्या करना है। यह सुनते ही दूसरे दल के नेता बांके लाल जी ने कुर्सी उनकी ओर खिसका ली और आशा भरी नजरों से उन्हें देखने लगे। ठल्लू साहब ने घोषणा की कि-
-’’हम बूथों पर दो दुनी आठ का तरीका आजमायेंगे।’’
चमचों ने भी आपनी खाट बगल में खींच ली। दो दुनी चार तो वे सुनते आ रहे थे लेकिन यह नई तकनीक थी। अमृतकाल चल रहा है। हो सकता है कि अब दो दुनी आठ होने लगे हों। साहब का चेहरा दमकने लगा था। उन्होंने कहना शुरू किया-
-’’ ऐलान कर दिया जाये कि बूथ पर आने वाले हर वोटर को साबुन की एक टिकिया फ्री में दी जायेगी। नारा होगा ’स्याही दिखाओ, साबुन पाओ’। साबन की लालच में वोटर अपने घरों से निकल कर जरूर आयेगा। बस किसी तरह उनके वोट डल जायें, उसके बाद उनकी जरूरत ही क्या रहेगी। खुद ही पीछे-पीछे घूमने लगेंगे। ’’
बांके लाल जी को यह बात लानत की तरह लगी लेकिन लानत की चिंता उन्होंने कभी की नहीं थी। जेब काटने से लेकर विधायक काटने तक का सफर उन्होंने अपने इन्हीं गुणों के आधार पर तय किया था। उन्हें अच्छी तरह मालूम था कि वोटर खुद तो आने से रहे, धमकाने और लुभाने का जमाना नहीं रहा। मोबाईल ने लोकतंत्र का सत्यानाश करके रख दिया है। हर आदमी पत्रकार हो चुका है। विडियो बनाने को आतुर रहता है। कब कौन-सा विडियो वायरल हो जाये कहना मुश्किल। नेताओं को माई-बाप मानने को भी कोई तैयार नहीं है। मुद्दों की ऐसी मारामारी मची है कि मुद्दा एक और नेता अनेक हो गये हैं। ऐसे में ठल्लू की बात मानकर देखने में बुराई ही क्या है। उन्होंने जोर से कहा-
-’’ यह लोकतंत्र की हत्या है मगर यह काम हम आपको अकेले करने नहीं देंगे।’’
जोरदार ठहाके के साथ महिफिल खत्म हुई।
मौका देखकर लल्लन पहलवान ने भी अक्ल की बात कहने की कोशिश की -
-’’हुजूर, आपने जनता के लिए इतने काम किये हैं। आप अपील करके देखंे। हो सकता है आप जैसे जननेता की आवाज सुनकर जनता बूथों पर वैसे ही दौड़ी चलें आयें जैसे..........।’’
नेताजी समझ गये कि चमचे पर मक्खनबाजी का दौरा पड़ा है। उन्होंने बात काटते हुये कहा-
-’’बेटा, मक्खन का अधिक इस्तेमाल दिल के लिए घातक हो सकता है। अपनी जीभ को लगाम और दिमाग को ऐंड़ लगाओ। हमें भी मालूम है कि हमारी अपील पर चिड़िया का बच्चा भी नहीं आने वाला। वह जमाना गया जब हम इलाके के बाहुबलि हुआ करते थे। अब तो बस साबुन का ही भरोसा है। सफल लोकतंत्र में जनता की दृष्टि नाक पर और नेता की साख पर लगी ही रहती है। जनता जानती है कि बाद में उसे कोई पूछेगा नहीं इसलिए उसे तत्काल लाभ चाहिए। हम उसकी इच्छा पूरी करेंगे।’’
नेताजी ने गहरी सांस ली।
चुनाव प्रचार समाप्त हो गये। लोगों में इसबात की चर्चा जोरों पर थी कि ’ठल्लू पार्टी’ साबुन देगी, ’जनसेवा दल’ वाले दो किलो सत्तू देंगे और ’सत्तासेवी दल’ सबको एक-एक गंजी देने वाली है। जनता को अपने वोटों की ताकत का एहसास पहली बार हुआ। काश, एक आदमी तीन वोट दे सकता तो साबुन से हाथ धोकर, सत्तू खाता, गंजी पहनकर निकल जाता। लोग बेरोजगारी वाली बात भूल चुके थे। रोजगार तो कहीं न कहीं खोज ही लेंगे जिसने हाथ दिये हैं वही रोजगार देगा। अधिक हुआ तो मंदिर में एक दिया और जला देंगे लेकिन फोकट का साबुन और सत्तू पूर्व जन्मों के पुण्य से ही मिलता है। हर घर से एक रोजगार तो सरकार दे देगी, एक-दो खुद खोज लेंगें। कौन-सी साहूकारी करनी है। मजदूरी कहीं भागी नहीं जा रही। जिनके परिवार में एक या दो वोटर थे वे बेचारे मारे अफसोस के मरे जा रहे थे कि साबुन और सत्तू ही हाथ लगेगा। गंजी तो रह ही जायेगा। खुश वे लोग थे जिनके परिवार में वोटरों की संख्या आठ-दस थी। चुनाव आते-आते सभी दलों की और से आफॅर आ गये। चॉकलेट से लेकर, हींगगोली तक के आफॅर थे।
वोट देने वाले दिन लोकतंत्र का महापर्व अपने परवान पर था। बूथों पर महामेला लग चुका था। चॉकलेट, मुड़मुड़े, गुड़, साबुन, सत्तू, गंजी और गमछा के स्टॉल सज गये थे। दाम तो चुकाना था नहीं बस अंगुली में लगी स्याही दिखानी है। सात बजते-बजते आधे किलोमीटर की लाईन लग चुकी थी। औरतों की लाईन में भीड़ अधिक थी जो साबुन की लालच में लगी थीं। लाईन में एक महिला दूसरे से बात कर रही थी-
-’’ साबुन वाली पार्टी का नेता कौन है ?’’
-’’ क्या पता। हमें क्या करना है जानकर ? साबुन दे दे और हम निकलें। मैने तो कल कपड़ा भी नहीं धोया था कि कौन जाये अपना साबुन घिसने।’’
-’’ सो तो है ही। इतने सालों से वोट दे रहे है। पहली बार लगे हाथ लाभ हो रहा है नहीं ंतो पता ही नहीं चलता था कि वोट जा कहां रहे हैं।’’
तभी साथ में खड़ी कमला आंटी ने कहा-
-’’ मुझे सत्तू लाने के लिए कहा है बच्चों ने। लिट्टी बनाना है। साबुन तो मेरा बेटा ले आया था। वह साबुन की फैक्ट्री में काम करता है। सत्तू लेकर आधे किलो का लिट्टी बनाऊंगी और बाकी को रख दूंगी। बेटी आने वाली है ससुराल से। नाती को भी लिट्टी बहुत पसंद है।’’
पुलिस ने आकर हड़काया।
-’’बातें कम करो। बढ़ती रहो।’’
पुरूषों की लाईन में भी खूब बातें चल रही थीं।
-’’ अजी मैं तो कहता हूं कि सभी पार्टियां बराबर ही हैं। भ्रष्टों का जमवाड़ा है। ईमानदारी नाम की चीज तो गायब ही हो गई है। मजा तो तब आये तो जब स्याही पोंछ कर दुबारा वोट डालकर डबल लाभ उठाया जाये। दुनिया में बेईमान है तो शरीके गम हम भी सही। हमारे सुधरने से कौन-सी क्रांति हो जायेगी ? कोई जीते कोई हारे, हमारा तो वही रोज का धंधा है।’’
बात ईमान की हो तो हर आदमी एक्सपर्ट हो जाता है सो लल्लन मियां भी बातचीत में घुस गये।
-’’नेताओं से उम्मीद करना तो चील के घोंसले में मांस खोजने के बराबर मुश्किल काम है। इनसे तो जो मिले एंेठने में ही अक्लमंदी है। अब देखिये, ठल्लू पार्टी के उम्मीदवार पी के ठल्लू को ही। कभी पी के पड़ा रहता था। मारपीट करता घूमता था। अब मंत्री है। तो साहब, हमने तो उनको वोट नहीं दिये थे। मंत्री कैसे बने ? हमारे चाहने से कुछ नहीं होगा। अल्लाह की मर्जी है बस। सत्तू लेकर निकल जाओ और गंजी की जुगत लगाओ।’’
जोरदार ठहाका लगा। शाम होते-होते अस्सी प्रतिशत मतदान हुए। वही बूथों पर नहीं आये जो या तो गांव में नहीं थे या धरती पर। चुनाव आयोग के अनुसार यह अमृतकाल का असर था कि जनता का भरोसा लोकतंत्र पर अधिक मजबूत हो गया है। बस एक गुत्थी नहीं सुलझ पाई कि वोट पड़े पंद्रह सौ मगर साबुन पच्चीस सौ कैसे बंट गये ?
शशिकांत सिंह ’शशि’
जवाहर नवोदय विद्यालय
मनहारा सुखासन
सिंगेश्वर, मधेपुरा 852128
बिहार
फोन- 7387311701

बढ़िया है. बधाई. एक दूनी की वर्तनी चेक कीजिएगा.
जवाब देंहटाएंबहुत सटीक व्यंग्य..बधाई हो👌🏻👌🏻👍👍👏👏
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